भारत में जीवन और मृत्यु से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर समय-समय पर बहस होती रही है। इन्हीं मुद्दों में से एक है पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia)। यह ऐसा विषय है जिसमें मानवीय संवेदना, चिकित्सा नैतिकता और कानून—तीनों का गहरा संबंध है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों के बाद इस विषय पर कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है।
पैसिव यूथेनेशिया क्या है
पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है ऐसी स्थिति में मरीज का इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटाना, जब वह गंभीर रूप से बीमार हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो। इस प्रक्रिया में डॉक्टर जानबूझकर मरीज की जान नहीं लेते, बल्कि केवल जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपचार को रोक दिया जाता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि कोई मरीज लंबे समय से कोमा में है या उसे लाइलाज बीमारी है और वह केवल वेंटिलेटर या अन्य मशीनों की मदद से जीवित है, तो परिवार और चिकित्सकीय अनुमति के आधार पर उन मशीनों को हटाने की प्रक्रिया को पैसिव यूथेनेशिया कहा जाता है।
इसके विपरीत एक्टिव यूथेनेशिया में किसी दवा या इंजेक्शन के जरिए जानबूझकर मरीज की मृत्यु कराई जाती है, जो भारत में अब भी गैरकानूनी है।
भारत में कानूनी स्थिति
भारत में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता देने की दिशा में सबसे बड़ा फैसला Aruna Shanbaug Case में आया। वर्ष 2011 में Supreme Court of India ने इस ऐतिहासिक मामले में पहली बार कुछ शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी।
अरुणा शानबाग मुंबई के एक अस्पताल में नर्स थीं, जो 1973 में हमले के बाद दशकों तक कोमा में रहीं। इस मामले में अदालत ने कहा कि यदि मरीज स्थायी रूप से अचेत अवस्था में है और ठीक होने की संभावना नहीं है, तो अदालत की अनुमति से जीवन रक्षक उपकरण हटाए जा सकते हैं।
इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण फैसला दिया, जिसे Common Cause Case 2018 के नाम से जाना जाता है। इस फैसले में अदालत ने कहा कि सम्मान के साथ मरना भी जीवन के अधिकार का हिस्सा है, जो Article 21 of the Constitution of India के तहत आता है।
इस निर्णय में अदालत ने “लिविंग विल” (Living Will) या एडवांस डायरेक्टिव को भी मान्यता दी। इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखकर यह तय कर सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह स्वयं निर्णय न ले सके, तो उसे जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए।
पैसिव यूथेनेशिया के लिए प्रक्रिया
* सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया लागू करने के लिए कुछ सख्त दिशानिर्देश तय किए हैं।
* मरीज की स्थिति बेहद गंभीर और लाइलाज होनी चाहिए।
* मरीज या उसके परिवार की सहमति आवश्यक होती है।
* अस्पताल की एक मेडिकल बोर्ड मरीज की स्थिति का मूल्यांकन करती है।
* दूसरा स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड भी निर्णय की पुष्टि करता है।
* पूरी प्रक्रिया को कानूनी और चिकित्सकीय रूप से दस्तावेजित किया जाता है।
* इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मरीज की मृत्यु जल्दबाजी या गलत कारणों से न हो।
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नैतिक और सामाजिक बहस
पैसिव यूथेनेशिया को लेकर समाज में अलग-अलग राय है। कुछ लोग इसे मानवीय निर्णय मानते हैं, क्योंकि इससे असहनीय दर्द और कृत्रिम जीवन से मुक्ति मिल सकती है। वहीं कुछ लोग इसे जीवन के अधिकार के खिलाफ मानते हैं और आशंका जताते हैं कि इसका दुरुपयोग हो सकता है।
डॉक्टरों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सख्त नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया के कारण दुरुपयोग की संभावना कम हो जाती है। साथ ही, यह निर्णय आमतौर पर तब लिया जाता है जब चिकित्सा विज्ञान के पास मरीज को बचाने का कोई विकल्प नहीं बचता।

