नई दिल्ली: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हालिया तेजी के बावजूद भारत में महंगाई पर इसका बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। उन्होंने बताया कि देश में मुद्रास्फीति पहले से ही निचले स्तर के करीब बनी हुई है, जिससे तेल कीमतों में बढ़ोतरी का प्रभाव सीमित रह सकता है।
लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में निर्मला सीतारमण ने बताया कि पिछले एक वर्ष के दौरान वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और भारतीय बास्केट (भारतीय रिफाइनरियों द्वारा खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की औसत अंतरराष्ट्रीय कीमत) में लगातार गिरावट का रुझान देखा गया था। हालांकि, 28 फरवरी 2026 को पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है।
उन्होंने कहा कि फरवरी के अंत से 2 मार्च 2026 के बीच भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 80.16 डॉलर प्रति बैरल हो गई। इसके बावजूद फिलहाल देश में महंगाई पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं मानी जा रही है।
वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी और उसके संभावित प्रभावों पर लगातार नजर बनाए हुए है।
इस बीच अमेरिका और इजराइल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर किए गए सैन्य हमले के बाद वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। इसके जवाब में ईरान ने क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और इजराइल पर भी हमले किए, जिससे तेल कीमतों में उछाल आया है।
सीतारमण ने यह भी कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक की अक्टूबर 2025 की मौद्रिक नीति रिपोर्ट के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमतें आधारभूत अनुमान से 10 प्रतिशत अधिक रहती हैं और उसका पूरा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है, तो मुद्रास्फीति लगभग 0.3 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
हालांकि महंगाई पर तेल कीमतों का वास्तविक प्रभाव कई कारकों पर निर्भर करता है। इनमें रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव, वैश्विक मांग और आपूर्ति की स्थिति, मौद्रिक नीति का असर, सामान्य महंगाई का स्तर और अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव शामिल हैं।
आंकड़ों के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित औसत खुदरा महंगाई 2025-26 (अप्रैल से जनवरी) के दौरान घटकर 1.8 प्रतिशत रह गई। यह 2024-25 में 4.6 प्रतिशत और 2023-24 में 5.4 प्रतिशत थी।

