तिरुवनंतपुरम: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना लिखित पक्ष प्रस्तुत किया है। आगामी केरल चुनावों से पहले दाखिल इस हलफनामे में केंद्र ने स्पष्ट किया है कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसी भेदभाव या अशुद्धता की धारणा पर आधारित नहीं है, बल्कि यह भगवान भगवान अय्यप्पा की “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” (आजीवन ब्रह्मचर्य) परंपरा को बनाए रखने के लिए लागू किया गया है।
परंपरा और धार्मिक आस्था का हवाला
केंद्र सरकार ने अपने बयान में कहा कि इस आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देने से वहां की मूल पूजा पद्धति और परंपरागत धार्मिक स्वरूप में बदलाव आ सकता है। इससे धार्मिक विविधता और आस्था की स्वतंत्रता पर भी असर पड़ सकता है, जिसे भारतीय संविधान संरक्षण देता है।
सुप्रीम कोर्ट में आज से सुनवाई
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में आज (7 अप्रैल) से शुरू हो रही है। यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी। कोर्ट इस दौरान धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं जैसे व्यापक मुद्दों पर भी विचार करेगा।
संत समिति ने भी दी दखल की अर्जी
इस मामले में अखिल भारतीय संत समिति ने भी हस्तक्षेप की अनुमति मांगी है। संगठन का कहना है कि अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन-सी धार्मिक प्रथाएं आवश्यक हैं, क्योंकि न्यायाधीश धार्मिक आस्था के मामलों में विशेषज्ञ नहीं होते।
2018 के फैसले से शुरू हुआ विवाद
यह विवाद वर्ष 2018 में उस समय शुरू हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि यह प्रथा महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और इसलिए असंवैधानिक है।
अब 9-न्यायाधीशों की पीठ करेगी समीक्षा
अब इस मामले की सुनवाई नौ-न्यायाधीशों की पीठ करेगी, जो धार्मिक परंपराओं और समानता व भेदभाव-रहित अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के सवाल पर विचार करेगी।

