नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार को 2014 के बाद पहली बार संसद में बड़ा झटका लगा है। लोकसभा में संविधान संशोधन बिल आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका। इसके बाद विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए महिला आरक्षण को लेकर वैकल्पिक सुझाव पेश किए हैं।
क्या है पूरा मामला?
लोकसभा में पेश किए गए इस बिल का उद्देश्य महिला आरक्षण लागू करने के लिए सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करना था। हालांकि, मतदान के दौरान यह बिल दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाया।
• पक्ष में वोट: 298
• विरोध में वोट: 230
• आवश्यक वोट: 352
इस हार के बाद सरकार ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल इससे जुड़े अन्य बिल—डिलिमिटेशन बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन बिल—को आगे नहीं बढ़ाएगी।
विपक्ष का ‘प्लान बी’: 543 सीटों में ही 33% आरक्षण
प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सरकार से सवाल करते हुए कहा कि अगर सरकार सच में ‘नारी शक्ति’ की समर्थक है, तो 2029 के चुनाव से पहले 543 सीटों में से 180 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित क्यों नहीं करती।
उन्होंने दो विकल्प सुझाए:
• सीधे 180 सीटों पर आरक्षण लागू करें
• महिला आरक्षण को जनगणना और डिलिमिटेशन से अलग (delink) करें
• कांग्रेस और अन्य नेताओं का समर्थन
प्रियंका गांधी और K. C. Venugopal समेत कई विपक्षी नेताओं ने भी यही मांग दोहराई।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण के बहाने डिलिमिटेशन के जरिए राजनीतिक नक्शा बदलने की कोशिश कर रही है, जिससे दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों पर असर पड़ सकता है।
सरकार का पलटवार
अमित शाह ने विपक्ष पर तीखा हमला करते हुए कहा कि महिला आरक्षण बिल की असफलता का जश्न मनाना महिलाओं का अपमान है।
वहीं किरेन रिजिजू ने कांग्रेस को ‘महिला विरोधी’ बताते हुए कहा कि सरकार महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।
आगे क्या?
सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पुराने महिला आरक्षण बिल को लागू करने की मांग करेंगे। साथ ही, INDIA गठबंधन देशभर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मुद्दे को उठाने की तैयारी कर रहा है।



