नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने यूट्यूबर एल्विश यादव को बड़ी राहत देते हुए नोएडा में कथित सर्प विष मामले में दर्ज प्राथमिकी (FIR) और उससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाहियों को गुरुवार को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मामला कानून के तहत टिकाऊ नहीं है।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मामले में स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के प्रावधान लागू नहीं होते। अदालत ने पाया कि सह-आरोपियों से बरामद कथित तरल पदार्थ अधिनियम की निर्धारित सूची में शामिल नहीं है, इसलिए इस कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।
पीठ ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 55 के तहत भी कार्यवाही को अवैध माना। अदालत के अनुसार, इस अधिनियम के तहत अभियोजन केवल अधिकृत अधिकारी द्वारा दायर शिकायत के आधार पर ही शुरू किया जा सकता है, जबकि इस मामले में शिकायतकर्ता अधिकृत नहीं था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकृत प्राधिकारी को यह स्वतंत्रता दी कि वह कानून के अनुसार उचित शिकायत दायर कर नई कार्यवाही शुरू कर सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यादव के पास से कोई बरामदगी नहीं हुई है और आरोप मुख्य रूप से सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित हैं। साथ ही, भारतीय दंड संहिता के तहत लगाए गए आरोप गुरुग्राम में पहले दर्ज एक मामले से जुड़े थे, जिसमें पहले ही क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी है।
गौरतलब है कि एल्विश यादव के खिलाफ यह मामला 22 नवंबर 2023 को दर्ज किया गया था और उन्हें 17 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने एक रेव पार्टी में मनोरंजन के लिए सांप के विष के इस्तेमाल की व्यवस्था की थी।यादव ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें आरोप पत्र और निचली अदालत के संज्ञान आदेश को रद्द करने से इनकार किया गया था।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक भी लगाई थी और टिप्पणी की थी कि यदि लोकप्रिय व्यक्तियों द्वारा बेजुबान जीवों का इस तरह उपयोग किया जाता है, तो यह समाज के लिए गलत संदेश हो सकता है।सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के साथ ही इस मामले में एल्विश यादव को फिलहाल बड़ी कानूनी राहत मिल गई है।



